आचार्य श्रीमिथिलेशनन्दिनीशरण जी महाराज

आचार्य श्रीमिथिलेशनन्दिनीशरण जी श्रीरामानन्दीय वैष्णव परम्परा के एक प्रतिनिधि सन्त-व्यक्तित्व हैं। आप भारतीय सनातन धर्म के शास्त्रीय पक्ष और उसकी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सुसंगत व्याख्या को लेकर प्रतिबद्ध हैं। संवाद को जनसामान्य तक ले जाकर उनकी आस्थाओं को सम्मान देना प्राथमिकता है।

आचार्य जी की प्रारम्भिक शिक्षा उनकी जन्मभुमि  पर हुई। तदुपरान्त सन् १९९३ से अयोध्या में रहते हुये धर्म-अध्यात्म और उपासना के बीच आपने नव्यव्याकरण विषय से शास्त्री (ग्रेजुएट) किया। अवध विश्वविद्यालय से आपने हिन्दी में परास्नातक (पोस्ट ग्रेजुएट) किया। तथा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय , वाराणसी से आपने धर्मशास्त्र विभाग में आचार्य परीक्षा उत्तीर्ण की। विभाग में विश्विद्यालय के सर्वाधिक अंक पाने वाले छात्र के रूप में आपने तीन स्वर्णपदक प्राप्त किये।

केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की शोध-योजना में CRET के अन्तर्गत चयनित होकर आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभाग से डी.फिल. उपाधि हेतु तुलसी साहित्य पर केन्द्रित शोध कार्य किया।

छात्र-जीवन से ही आचार्यजी अनेक साहित्यिक-सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में निरन्तर सक्रिय रहे। समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में लेखन के साथ ही आकाशवाणी पर आपकी वार्तायें प्रसारित होती रही हैं। अनेक विश्वविद्यालयों , शोध-संस्थानों समेत देश के विभिन्न क्षेत्रों में आपके व्याख्यान-प्रवचन होते रहते हैं।

सन् २०१२ में श्री अयोध्या जी की महान् विभूति पूज्य श्री कौशलकिशोरशरण जी महाराज ‘फलाहारी बाबा’ वे विरक्त दीक्षा लेकर आपने औपचारिक रूप से आध्यात्मिक जीवन अंगीकार किया है।

आपका प्रखर वैदुष्य , ओजस्वी वक्तृता और सरल साधुभाव  समाज के सभी वर्गों में समादृत हैं। वर्तमान में आचार्य जी रसिकोपासना के आचार्यपीठ श्रीलक्ष्मण किला के व्यवस्थापक हैं और इसी आश्रम के विस्तार श्री अनादि पञ्चमुखी महादेव मन्दिर में रहते हैं।